हरिद्वार। राजनीति में रहते हैं कि परिपक्व राजनीतिज्ञ वही है जो किसी भी मुद्दे को अपने हाथ से न जाने दे। हरिद्वार ग्रामीण से कांग्रेस विधायक अनुपम रावत के अति आत्मविश्वास की वजह से एक मुद्दा उनके हाथ से जाता रहा। वैसे तो अनुपम रावत कांग्रेस के दिग्गज नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की पुत्री हैं लेकिन उन्होंने आसानी से इतने बड़े मुद्दे को गंवा दिया। अब इसका असर क्या होगा यह तो आगामी विधानसभा चुनाव के बाद पता चलेगा। लेकिन चर्चाएं हैं कि हरिद्वार ग्रामीण की कांग्रेस विधायक अनुपम रावत न केवल अति आत्मविश्वासी है बल्कि अति उत्साहित भी है जिसका परिणाम यह रहा की रवसान नदी पर बनने वाले झूला पुल का मुद्दा उनके हाथ से जाता रहा।
रवासन नदी पर झूला पुल बनाने की मांग को लेकर हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र में अब सियासी पारा चढ़ने लगा है। कुछ दिन पहले एक छात्र की मौत के बाद कांग्रेस विधायक अनुपमा रावत ने समर्थकों के साथ प्रदर्शन करते हुए प्रशासन को 10 दिन का अल्टीमेटम दिया था। लेकिन अगले ही दिन ग्रामीणों ने ऐसा मोर्चा संभाला कि विधायक के हाथ से यह मुद्दा मानो निकलकर सीधे ग्रामीणों के हाथ में चला गया। सैकड़ों ग्रामीणों ने मौके पर पहुंचकर धरना शुरू कर दिया। खास बात यह रही कि ग्रामीणों ने प्रशासन के मौखिक आश्वासन से समझौता करने के बजाय अपना धरना जारी रखा। पहले तहसीलदार धरना स्थल पर पहुंचे और ग्रामीणों को पुल निर्माण जल्द शुरू कराने का भरोसा दिलाया। इसके बाद एसडीएम भी लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों को साथ लेकर पहुंचे। अधिकारियों ने ग्रामीणों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन ग्रामीण अपनी मांग पर अड़े रहे।ग्रामीणों का साफ कहना है कि उन्हें अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि पुल निर्माण का काम जमीन पर शुरू होता हुआ चाहिए। यही वजह है कि अधिकारियों के समझाने के बावजूद धरना लगातार जारी है।
इधर, अपने मुद्दे को ग्रामीणों के हाथ में जाता देखकर विधायक अनुपमा रावत ने भी आज एक बार फिर पुल की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। हालांकि अब परिस्थितियां कुछ अलग नजर आ रही हैं। जिस मुद्दे को लेकर विधायक ने सबसे पहले प्रशासन पर दबाव बनाया था, उसी मुद्दे पर ग्रामीणों ने स्वतंत्र मोर्चा खोल दिया है।
विधानसभा चुनाव नजदीक होने के बीच यह घटनाक्रम क्षेत्र की राजनीति के लिए भी खासा दिलचस्प बन गया है। अब देखना यह होगा कि रवासन नदी पर पुल पहले बनता है या ग्रामीणों का धरना पहले खत्म होता है। फिलहाल ग्रामीणों के तेवर बता रहे हैं कि केवल मौखिक आश्वासन से वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
