वरिष्ठ पत्रकार डॉ रमेश खन्ना की कलम से…
मुद्दा यहाँ किसी पार्टी की जीत या हार का नहीं हैँ। न ही किसी नेता के समर्थन या विरोध का हैँ। असली सवाल सिर्फ इतना हैँ कि क्या सत्ता की हवस में लोकतंत्र की आत्मा को कुचल देना सही हैँ?
अगर आज देश के कुछ लोग सिर्फ इसलिए चुप हैं क्योंकि उनकी पसंद की सरकार सत्ता में है, तो याद रखिए… वो अपने ही बच्चों के पैरों तले वो जमीन खोद रहे हैं, जहाँ कल उनके पास न अधिकार बचेंगे, न आवाज, न न्याय, और न ही उम्मीद।
आज जो हो रहा है, वो सिर्फ राजनीति नहीं हैँ… एक दो लोगो का लगभग पूरे सिस्टम पर कब्ज़ा हो चुका हैँ। संवैधानिक संस्थाएँ, जाँच एजेंसियाँ, न्याय व्यवस्था, मीडिया, सुरक्षाबल सबको सत्ता की ढाल और हथियार में बदल दिया गया है। सबसे खतरनाक बात? इस सबको राष्ट्रहित, धर्म, राष्ट्रवाद और मजबूत नेतृत्व के नाम पर उचित ठहराया जा रहा हैँ। आज भले ही देश की कुछ प्रतिशत जनता को सेडेटिव ऑर्गेज्म मिल रहा हैँ लेकिन याद रखो सत्ता ना तो स्थाई हैँ और ना ही सत्ता पर बैठा महामानव अमर है। आज विश्वगुरु एंड पंटर अपनी सत्ता की अश्लील हवस में संस्थाओं, इंस्टिट्यूट को बर्बाद कर रहे हैँ। कल कोई विरोधी सत्ता आई और उसको ये सब कूकर्म विरासत में मिलेंगे , सारा सिस्टम तैयार मिलेगा तो फिर किस मुँह से विरोध करोगे ? फिर तुम्हारी सुनेगा कौन ? फिर अपने बच्चों को किस देश मे भगावोगे?
सत्ता की अंधी भूख में अगर संस्थाओं को ही बर्बाद कर दिया गया, तो आने वाली हर सत्ता उसी सड़े हुए सिस्टम का इस्तेमाल करेगी। फिर लोकतंत्र सिर्फ किताबों में बचेगा और कहीं नहीं।
