हरिद्वार। भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विकसित भारत में संस्कृत का योगदान विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकान्त पाण्डेय ने कहा कि संस्कृत को केवल धर्म और कर्मकांड से जोड़कर देखना अधूरा सच है। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारत की हजारों वर्षों पुरानी अखंड बौद्धिक परंपरा की संवाहक भाषा है, जिसने पूरे देश को सांस्कृतिक और ज्ञानात्मक रूप से एक सूत्र में बांधने का कार्य किया।
लेखक गांव, थानों में आयोजित संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. पाण्डेय ने कहा कि यह आयोजन केवल अकादमिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की आत्मा से संवाद का प्रयास है। उन्होंने कहा कि संस्कृत के माध्यम से विश्व की उस महान सभ्यता की चर्चा होती है जिसकी ज्ञानधारा आज तक निरंतर प्रवाहित हो रही है।
उन्होंने कहा कि आर्यभट्ट का शून्य सिद्धांत, भास्कराचार्य का कलन, वराहमिहिर की बृहत्संहिता, चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे ग्रंथ संस्कृत की वैज्ञानिक और बौद्धिक समृद्धि के प्रमाण हैं। आज भी आईआईटी संस्थानों में पाणिनि के व्याकरण का अध्ययन कंप्यूटर साइंस में किया जाता है। उन्होंने कहा कि सुश्रुत को विश्व प्लास्टिक सर्जरी का जनक मानता है, जबकि चरक ने हजारों वर्ष पहले ही मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के संबंध को स्पष्ट किया था।
प्रो. पाण्डेय ने कहा कि भरतमुनि का नाट्यशास्त्र विश्व का पहला नाट्य ग्रंथ माना जाता है। उन्होंने चीनी यात्री ह्वेनसांग का उल्लेख करते हुए कहा कि सातवीं शताब्दी में उसने लिखा था कि “कश्मीर से समुद्र तक विद्वान संस्कृत में संवाद करते हैं।” बिना आधुनिक संचार साधनों के संस्कृत ने पूरे भारत को सांस्कृतिक रूप से जोड़े रखा।
उन्होंने कहा कि आदि शंकराचार्य ने केरल में जन्म लेकर संस्कृत में ग्रंथों की रचना की और चार धामों की स्थापना कर भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया। यदि संस्कृत न होती तो भारत सांस्कृतिक रूप से इतना संगठित नहीं रह पाता।
संगोष्ठी की अध्यक्षता भारत सरकार के पूर्व शिक्षा मंत्री ने की। कार्यक्रम में उत्तराखंड सरकार के संस्कृत शिक्षा मंत्री , , तथा सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
इस अवसर पर लेखक गांव थानों में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय और स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय के बीच एक एमओयू पर भी हस्ताक्षर किए गए।
