हरिद्वार 8 मार्च। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में दो दिवसीय इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (आईसीएसएसआर) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए स्वदेशी तकनीकें और सामाजिक समावेशन के प्रभावी तरीके अवधारणा और अनुप्रयोग का समापन हुआ। संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों से आए शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विशेषज्ञों ने मानसिक स्वास्थ्य, स्वदेशी ज्ञान परंपराओं और सामाजिक समावेशन से जुड़े विविध विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
समापन सत्र के मुख्य अतिथि देसंविवि के प्रतिकुलपति युवा आइकॉन डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि वर्तमान समय में मानसिक स्वास्थ्य वैश्विक स्तर पर एक गंभीर चुनौती के रूप में उभर रहा है। ऐसे में भारतीय संस्कृति और परंपरा में निहित स्वदेशी ज्ञान प्रणालियाँ मानसिक संतुलन, सामाजिक सामंजस्य और समग्र कल्याण के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। प्रतिकुलपति ने कहा कि भारतीय दर्शन, योग, ध्यान तथा जीवन मूल्यों पर आधारित परंपराएँ केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्याओं के समाधान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ. पण्ड्या ने संगोष्ठी के दौरान प्रस्तुत शोधपत्रों और विचारों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के अकादमिक मंच विद्वानों और शोधकर्ताओं को विचारों के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। अंत:विषयक अनुसंधान आज के समय की आवश्यकता है। जब विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ एक साथ मिलकर किसी समस्या पर विचार करते हैं, तो उसके अधिक प्रभावी और व्यावहारिक समाधान सामने आते हैं। उन्होंने संगोष्ठी में सक्रिय भागीदारी निभाने वाले शिक्षाविदों, शोधार्थियों और प्रतिभागियों को बधाई देते हुए उन्हें अपने शोध कार्यों को समाज के व्यापक हित में आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
दो दिवसीय संगोष्ठी का समापन स्वदेशी ज्ञान, सामाजिक समावेशन और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनुसंधान, सहयोग और संवाद को आगे बढ़ाने की सामूहिक प्रतिबद्धता के साथ हुआ। वक्ताओं ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि एक मानसिक रूप से स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए सामाजिक समावेश को जमीनी स्तर पर लागू करना होगा। कार्यक्रम के अंत में संगोष्ठी के सफल आयोजन के लिए आयोजकों, वक्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।
