हरिद्वार। नगर निगम की जमीन से जुड़े कथित घोटाले में अब नई नई परतें खुलती जा रही हैं। जिस भूमि को धारा 143 के तहत अकृषक घोषित किया गया, उसकी प्रक्रिया को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। खासतौर पर SDM कोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिससे पूरे मामले में योजनाबद्ध तरीके से कार्य किए जाने की आशंका गहराती जा रही है। जानकारी के अनुसार, SDM कोर्ट में आमतौर पर 143 से संबंधित सभी कार्य अहलमद द्वारा संपन्न किए जाते हैं, जबकि पेशकार की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन इस विशेष मामले में तत्कालीन SDM ने स्थापित नियमों को दरकिनार करते हुए यह जिम्मेदारी अपने निजी सहायक को सौंप दी। हैरानी की बात यह है कि संबंधित व्यक्ति इस कार्य के लिए अधिकृत भी नहीं था, जो स्पष्ट रूप से प्रक्रिया का उल्लंघन माना जा रहा है। इतना ही नहीं, जब 143 की रिपोर्ट SDM तक पहुंचती है तो उसे ‘मिसलबंद रजिस्टर’ में दर्ज किया जाता है। लेकिन इस मामले में केवल इसी भूखंड के लिए अलग से एक रजिस्टर तैयार किया गया, जिसमें न तो पहले के मामलों का कोई रिकॉर्ड है और न ही बाद के मामलों का। यह असामान्य कदम भी संदेह को और मजबूत करता है। नोटिस प्रक्रिया में भी बड़ा विचलन सामने आया है। राजस्व परिषद के मानकों के अनुसार 143 के मामलों में पक्षकारों को 21 दिन का नोटिस दिया जाना अनिवार्य होता है, लेकिन इस प्रकरण में केवल 7 दिन का नोटिस जारी किया गया। इसे भी प्रक्रिया में गंभीर छेड़छाड़ के रूप में देखा जा रहा है। पूरे मामले की जांच कर रहे सचिव स्तर के अधिकारी ने भी SDM कोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। हालांकि उन्होंने जमीन को 143 घोषित किए जाने के निर्णय पर सीधे टिप्पणी नहीं की, लेकिन अपनाई गई प्रक्रिया को संदिग्ध जरूर बताया है। इन तमाम तथ्यों से यह संकेत मिलता है कि तत्कालीन SDM को इस जमीन को 143 घोषित करने की असामान्य जल्दबाजी थी। साथ ही, कोर्ट की प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर इसे योजनाबद्ध तरीके से अंजाम देने की आशंका भी बलवती हो रही है। अब देखना होगा कि इस गंभीर मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है और जिम्मेदारों पर कब तक शिकंजा कसता है?
