हरिद्वार। (शांतनु शुक्ला) सूरीनाम की राजदूत हनीशा जयराम कल मेरे साथ हरिद्वार की धार्मिक यात्रा पर थीं। इस दौरान उन्हें मां मनसा देवी के दर्शन, गंगा आरती और आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज के दर्शन की विशेष इच्छा थी।
उनके परिवार की मूल जड़ें प्रतापगढ़ से जुड़ी हैं और उनके पूर्वज कई पीढ़ियां पहले सूरीनाम चले गए थे। लेकिन कल हरिद्वार की यात्रा के दौरान जिस श्रद्धा और आत्मीयता के साथ उन्होंने पूजा-अर्चना की, उसे देखकर महसूस हुआ कि चार पीढ़ियों की दूरी भी उनके भीतर बसे सनातन संस्कारों को मिटा नहीं सकी।
मंत्रों का सहज और शुद्ध उच्चारण, पूजा की विधि के प्रति उनकी गहरी आस्था और हर क्षण दिखाई देती श्रद्धा ने मुझे भी भावुक कर दिया। भारत से हजारों किलोमीटर दूर सूरीनाम में पली-बढ़ीं हनीशा जयराम के व्यवहार में भारतीय संस्कृति की वही सहज छाप दिखाई दी। उनके नाम में भी जयराम और उनके व्यवहार में भी जयराम। यह केवल एक राजदूत की धार्मिक यात्रा नहीं थी, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का एक भावुक क्षण था।सूरीनाम में भारतीय मूल के हिंदू आज भी अपने पर्व-त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान और सनातन संस्कारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं। हनीशा जयराम की यात्रा इसका जीवंत उदाहरण है। भारत से दूरी हजारों किलोमीटर की हो सकती है, लेकिन सनातन से दूरी पीढ़ियों की नहीं होती।
